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आंटी…आपको कोरोना हो गया है…आप हॉस्पिटल चलो.. भैया- रूक जाओ, रोटी बना रही हूं, बच्चे भूखे रहेंगे…!
उज्जैन:रैपिड रिस्पांस टीम का एक डॉक्टर जब कोरोना पॉजिटिव मरीज की लोकेशन मिलने के बाद उसे लेने पहुंचा तो एम्बुलेंस देखते ही घर में हलचल बढ़ गई। छोटे-छोटे बच्चे टुकूर-टुकूर देखने लगे। वे कुछ समझते, इसके पहले ही टीम का डॉक्टर एवं एक पुलिसवाला कार से नीचे उतरा और आवाज देकर बोल- आंटी…आपको कोरोना हो गया है। रिपोर्ट आ गई है। चलो हॉस्पिटल।
दो कमरों के कच्चे मकान के अंदर वाले कमरे से आवाज आई। भैया…थोडा रूक जाओ। रोटी बना रही हूं..बच्चे भूखे रहेंगे। इसके बाद आरआरटी का डॉक्टर बोला- आंटी, बच्चों को भी कोरोना कर दोगी। आप पॉजिटिव हो। घर में कोई और है या नहीं? जवाब आया- भैया, हाथ जोड़ती हूं, थोड़ा सा रूक जाओ। कुछ देर बाद रोती हुई महिला बाहर आई और थैली में कपड़े डालकर बोली- चलो…। बच्चे रूआंसे होते हुए उसे देख रहे थे। इधर रात को जब पिता घर आए तो बच्चे बोले- पुलिस आई थी, मां को ले गई। पिता के चेहरे पर चुप्पी थी। उसके पास न तो मोबाइल फोन है और न ही उसकी पत्नि के पास।
वह चर्चा में बोला- साहब, यूं भी कोरोना ने सबकुछ भगवान भरोसे कर दिया है। वह ठीक होकर आएगी या नहीं, भगवान ही जाने।यह किसी फिल्म की कहानी नहीं, शहर की एक पिछड़ी कॉलोनी में रहने वाले परिवार की व्यथा है। पति मजदूरी करने जाता है और पत्नि लोगों के घरों पर बर्तन-पौछा करने। पति ठीक है। पत्नि को किसी संपन्न परिवार से बर्तन धोने और पौछा लगाने के दौरान कोरोना मिला। जब खांसने लगी और सर्दी बंद नहीं हुई तो मोहल्ले के दवाखाने पर गई। डॉक्टर ने कहा कि सरकारी अस्पताल जाओ। वहां उसकी हालत देखकर सैंपल ले लिया। उसे कहा गया कि भर्ती हो जाओ। उसने हाथ जोड़कर कहा कि छोटे-छोटे बच्चे है। जब बोलोगे आ जाऊंगी। उस पर दया करके उसे घर भेज दिया। अब वह हॉस्पिटल ले जाई गई है। पति को यह भी नहीं पता कि कौन से हॉस्पिटल भेजा है। उसे इतना पता है कि ठीक हो गई तो 10 दिन बाद आ जाएगी। उसने इतना जरूर कहा- हमारी कोई जांच नहीं हुई। बच्चे तो मां के पास ही रहते थे। ये ठीक है। बीमार हुए तो हॉस्पिटल ले जाऊंगा।
जब सैंपल देने के बाद भी महिला ने कहा- मैंने तो सैंपल दिया ही नहीं
आरआरटी के डॉक्टर को पिछड़ी कॉलोनी में रहने वाली महिला का पता मिला, जो पॉजिटिव आई थी। डॉक्टर घर का पता पूछता हुआ कॉलोनी में पहुंचा। संबंधित घर पर गया तो महिला मिली। उसने कहा- हमने तो सैंपल नहीं दिया। इस नाम की एक महिला भी बस्ती में रहती है। आप वहां चले जाओ। डॉक्टर बताए गए पते पर पहुंचा तो महिला का नाम वही निकला लेकिन उसने कहा- हमने तो सैंपल नहीं दिया। एक ही नाम की दो महिला, दोनों इंकार कर रही। डॉक्टर ने पता लगवाया कि सैंपल किसने लिया था। जानकारी लगने पर संबंधित से चर्चा की। उसके बताए हुलिए अनुसार पहली वाली महिला पॉजीटिव आई थी। डॉक्टर पुन: पहुंचा और साथ चल रहे पुलिसकर्मी ने महिला को हड़काया। तो महिला बोली- हां, मेरा ही सैंपल लिया था। साथ ही कहा, मै साड़ी बदलकर आती हूं। आरआरटी के अनुसार रोजाना कुछ न कुछ ऐसा घट रहा है जो समाज के दो रूप सामने लाता है। कहीं संवेदनाओं की जरूरत है तो कहीं डांट फटकार के बगैर काम नहीं चलता।